Hemant Soren ED Case: झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को कथित 8.86 एकड़ भूमि घोटाले और मनी लॉन्ड्रिंग मामले में कानूनी तौर पर बड़ा झटका लगा है। मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम (PMLA) की विशेष अदालत ने उनकी याचिका खारिज कर दी है। अदालत के इस फैसले से अब मामले की सुनवाई का रास्ता खुल गया है। सोमवार को, विशेष PMLA अदालत ने अपना फैसला सुनाते हुए मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने खुद को निर्दोष घोषित किया था और मामले से बरी किए जाने की मांग की थी।
Hemant Soren ED Case: आखिर मामला क्या है?
यह मामला रांची के बरगैन इलाके में स्थित 8.86 एकड़ जमीन से जुड़ा है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) इस मामले की जांच मनी लॉन्ड्रिंग और कथित भूमि घोटाले के नजरिए से कर रहा है। ईडी का आरोप है कि जमीन से जुड़े दस्तावेजों और लेन-देन में अनियमितताएं पाई गई हैं, जिनकी जांच एजेंसी लंबे समय से कर रही है। इस मामले में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का नाम भी सामने आया है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने 5 दिसंबर, 2025 को विशेष न्यायालय में डिस्चार्ज याचिका दाखिल की। याचिका में उन्होंने दावा किया कि उनका इस मामले से कोई संबंध नहीं है और उन्हें झूठा फंसाया गया है। उन्होंने न्यायालय से उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर उन्हें मामले से बरी करने और उनके खिलाफ कार्यवाही समाप्त करने का अनुरोध किया।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद यह फैसला लिया गया
अदालत ने इस मामले में ईडी और बचाव पक्ष दोनों की विस्तृत दलीलें सुनीं। पिछली सुनवाई में दलीलें समाप्त होने के बाद अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। सोमवार को अदालत ने मुख्यमंत्री की डिस्चार्ज याचिका खारिज करते हुए अपना फैसला सुनाया। इस आदेश के बाद अब इस मामले में न्यायिक प्रक्रिया जारी रहेगी। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, डिस्चार्ज याचिका खारिज होने का मतलब है कि अदालत ने प्रथम दृष्टया मामले में दम पाया है। अगला कदम आरोप तय करना और मुकदमा चलाना हो सकता है। हालांकि, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के पास उच्च न्यायालय में इस फैसले को चुनौती देने का विकल्प है। इसलिए, आने वाले दिनों में एक नई कानूनी रणनीति देखने को मिल सकती है।
इस अदालती फैसले के बाद झारखंड की राजनीति में चर्चाएँ तेज़ हो गई हैं। विपक्षी दल इस मुद्दे पर सरकार पर हमला बोल सकते हैं, वहीं सत्ताधारी गठबंधन की ओर से भी प्रतिक्रिया आने की संभावना है। फिलहाल सभी की निगाहें मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन द्वारा इस फैसले के खिलाफ उठाए जाने वाले अगले कानूनी कदम और मामले की सुनवाई की दिशा पर टिकी हैं। यह मुद्दा आने वाले दिनों में भी झारखंड के राजनीतिक और कानूनी हलकों में चर्चा का प्रमुख विषय बने रहने की संभावना है।
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