Madhushravani 2026: सावन महीने के पहले सोमवार से मिथिलांचल क्षेत्र में लोक-आस्था और सांस्कृतिक परंपरा का प्रतीक, मधुश्रावणी का भव्य त्योहार शुरू हो गया है। नवविवाहित महिलाओं के लिए विशेष महत्व रखने वाला यह त्योहार उनके पतियों की लंबी उम्र, सुखद वैवाहिक जीवन और अटूट दांपत्य सुख की कामना के साथ मनाया जाता है। दरभंगा और मधुबनी सहित पूरे मिथिलांचल क्षेत्र के गांवों और कस्बों में इस त्योहार को लेकर भारी उत्साह देखा जा रहा है।
मधुश्रावणी के रीति-रिवाज 13 दिनों तक चलते हैं, जिसमें नई-नई शादीशुदा महिलाएं भगवान शिव, माता पार्वती और विषहरी की पूजा करती हैं। पूजा के साथ-साथ पारंपरिक लोक-कथाएं और पौराणिक कथाएं भी सुनाई जाती हैं। शिव-पार्वती का विवाह, गौरी की तपस्या, नाग-नागिन की कथाएं और बिहुला-विषहरी की कहानी इस त्योहार का अहम हिस्सा हैं।
Madhushravani 2026: कठोर नियमों का पालन
मधुश्रावणी के दौरान, व्रत रखने वाली महिलाएँ धार्मिक रीति-रिवाजों का पालन करती हैं। पारंपरिक रूप से, कई महिलाएँ बिना नमक के बना सात्विक भोजन करती हैं। इसमें अरवा (कच्चे) चावल से बना भोजन खाया जाता है और कई परिवारों में रात के समय भोजन न करने की परंपरा का भी पालन किया जाता है। इस त्योहार की एक खास बात यह है कि पूजा, पवित्र कथा के पाठ और ज़्यादातर धार्मिक रीति-रिवाजों में महिलाओं की अहम भूमिका होती है। आक और कनेर के फूलों से शिव-पार्वती की पूजा और फूल लोधी जैसी लोक परंपराएं मधुश्रावणी को अनोखा बनाती हैं।
विषहरी पूजा का विशेष महत्व
मधुश्रावणी के दौरान विषहरी की पूजा को भी बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। परंपरा के अनुसार, केले या मैना के पत्ते पर विषहरी की आकृति बनाई जाती है और देवी को लावा (भुने हुए चावल) और दूध का भोग लगाया जाता है। लोक गीतों और कहानियों के साथ किए जाने वाले ये धार्मिक अनुष्ठान पूरे माहौल को भक्ति-भाव से भर देते हैं।

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टेमी दागनी की परंपरा
‘टेमी दागनी’ परंपरा त्योहार के आखिरी दिन निभाई जाती है। पारंपरिक रूप से, इस रस्म को नवविवाहित महिलाओं की परीक्षा के तौर पर देखा जाता रहा है। हालाँकि, कई जगहों पर अब आग से होने वाली चोटों से बचने के लिए प्रतीकात्मक तरीके अपनाए जा रहे हैं। मधुश्रावणी की परंपरा को लेकर अलग-अलग मान्यताएं हैं, लेकिन आज इसे मनाते समय महिलाओं की सुरक्षा और सेहत को प्राथमिकता देना बहुत ज़रूरी है। किसी भी धार्मिक रीति-रिवाज के नाम पर जलने या चोट लगने का जोखिम नहीं उठाना चाहिए।
नई पीढ़ी के लिए संस्कृति से जुड़ने का अवसर
हाल ही में शादी के बंधन में बंधी इचिता झा ने बताया कि सावन के पवित्र महीने में भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करने और धार्मिक कथाएं सुनने से आध्यात्मिक शांति मिलती है। उनके अनुसार, मधुश्रावणी केवल एक धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि प्रकृति, लोक गीतों, पारिवारिक परंपराओं और मिथिला की सांस्कृतिक विरासत से जुड़ने का एक अवसर भी है। मधुश्रावणी के दौरान गूंजते लोकगीत, महिलाओं की सामूहिक पूजा और सदियों पुरानी परंपराएं मिथिला की समृद्ध सांस्कृतिक पहचान को जीवंत करती हैं। यही कारण है कि पूरे मिथिलांचल और अंग क्षेत्रों में हर साल यह त्योहार पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है।
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