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HC News: हाईकोर्ट ने सरकार के इस आदेश को किया रद्द, दिया 6 हफ्ते का समय

झारखंड हाई कोर्ट ने कर्मचारियों के संवैधानिक अधिकारों को लेकर एक अहम फ़ैसला सुनाया है। जस्टिस दीपक रोशन की अध्यक्षता वाली बेंच ने साफ़ किया कि किसी कर्मचारी को सिर्फ़ इसलिए नौकरी से नहीं हटाया जा सकता क्योंकि उसने अपने संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था।

HC News: हाईकोर्ट ने सरकार के इस आदेश को किया रद्द, दिया 6 हफ्ते का समय
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HC News: झारखंड हाई कोर्ट ने कर्मचारियों के संवैधानिक अधिकारों को लेकर एक अहम फ़ैसला सुनाया है। जस्टिस दीपक रोशन की अध्यक्षता वाली बेंच ने साफ़ किया कि किसी कर्मचारी को सिर्फ़ इसलिए नौकरी से नहीं हटाया जा सकता क्योंकि उसने अपने संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था। कोर्ट ने ऐसी कार्रवाई को मनमाना, दुर्भावनापूर्ण और ग़ैर-क़ानूनी माना।

HC News: संवैधानिक अधिकार के लिए कोर्ट पहुंचे कर्मचारी

यह मामला धारो उरांव और अन्य लोगों की ओर से दायर एक रिट याचिका से जुड़ा था। कोर्ट में याचिकाकर्ताओं की ओर से वकील अमृतांश वत्स पेश हुए। याचिकाकर्ताओं को 2004-05 की अवधि से स्वास्थ्य, चिकित्सा शिक्षा और परिवार कल्याण विभाग के इंजीनियरिंग सेल में क्लर्क, टाइपिस्ट, ड्राइवर और पंप ऑपरेटर जैसे विभिन्न पदों पर कॉन्ट्रैक्ट के आधार पर नियुक्त किया गया था।

2016 में विभाग के विलय के बाद भी, कर्मचारियों को जनवरी 2017 तक नियमित रूप से काम करने दिया गया। इसके बाद, उन्हें बिना किसी औपचारिक आदेश या कारण बताओ नोटिस के नौकरी से हटा दिया गया।इससे पहले एक संबंधित बेंच ने 4 फरवरी, 2017 को याचिकाकर्ताओं की सेवाओं को नियमित करने का आदेश दिया था। राज्य सरकार ने इस फैसले के खिलाफ अपील की लेकिन अपील को ₹25,000 के जुर्माने के साथ खारिज कर दिया गया। इसके बावजूद, विभाग ने 14 अगस्त, 2024 के एक आदेश के ज़रिए कर्मचारियों के नियमितीकरण के दावे को खारिज कर दिया।

‘कोर्ट जाने की सजा नौकरी से हटाना नहीं हो सकता’

हाई कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता दस साल से ज़्यादा समय से मंज़ूर किए गए पदों पर लगातार काम कर रहे थे और सक्षम अधिकारी ने उनकी नियुक्तियों को मंज़ूरी दी थी। कोर्ट ने राज्य के इस तर्क को नहीं माना कि कर्मचारियों को मंज़ूर किए गए पदों पर नियुक्त नहीं किया गया था। सुप्रीम कोर्ट के संबंधित फैसलों का हवाला देते हुए बेंच ने कहा कि अगर काम की प्रकृति लगातार चलने वाली और संस्थान के लिए ज़रूरी है, तो किसी नियुक्ति को सिर्फ़ इसलिए अनियमित नहीं माना जा सकता कि उसे ‘कॉन्ट्रैक्ट’ या ‘अस्थायी’ कहा गया है।

अदालत ने 14 अगस्त 2024 के सरकारी आदेशों को रद्द कर दिया। साथ ही अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ताओं को सभी संबंधित लाभों के साथ छह हफ़्ते के भीतर सेवा में बहाल करे और उन्हें नियमित करने का औपचारिक आदेश जारी करे।

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