Jharkhand Rajya Sabha Election: राज्यसभा चुनावों को लेकर झारखंड में राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। सत्ताधारी गठबंधन के भीतर दबाव की राजनीति अब खुलकर सामने आ रही है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की सहमति से पहले ही कांग्रेस पार्टी द्वारा अपने राज्यसभा उम्मीदवारों की घोषणा के बाद, झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) ने एक बड़ा राजनीतिक कदम उठाते हुए दोनों राज्यसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने का संकेत दिया है। इस घटनाक्रम ने राज्य की राजनीति को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया है।
Jharkhand Rajya Sabha Election: हेमंत सोरेन ने बुला ली आपात बैठक
गुरुवार देर शाम कांग्रेस ने अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष के सलाहकार प्रणव झा को राज्यसभा उम्मीदवार घोषित किया। राजनीतिक हलकों में इसे जम्मू-कश्मीर विधानसभा (जेएमएम) पर दबाव बनाने की रणनीति के रूप में देखा गया। हालांकि, यह रणनीति उलटी पड़ती नजर आ रही है। उम्मीदवार की घोषणा के तुरंत बाद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने जेएमएम विधायकों की आपातकालीन बैठक बुलाई, जिसमें राज्यसभा चुनाव रणनीति पर विस्तार से चर्चा की गई।
बैठक में उपस्थित अधिकांश विधायकों ने यह राय व्यक्त की कि जम्मू-कश्मीर भारतीय परिषद (जेएमएम) को राज्यसभा की दोनों सीटों पर उम्मीदवार उतारने चाहिए। बैठक के बाद मीडिया से बात करते हुए मंत्री हाफिजुल हसन ने कहा कि पार्टी ने सैद्धांतिक रूप से दोनों सीटों पर उम्मीदवार उतारने का फैसला कर लिया है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन उम्मीदवारों की अंतिम घोषणा करेंगे।
राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए, झारखंड विधानसभा में कांग्रेस के पास 16 विधायक हैं। राज्यसभा चुनाव जीतने के लिए 28 प्रथम वरीयता वोटों की आवश्यकता होती है। इसलिए, कांग्रेस को कम से कम 12 अतिरिक्त विधायकों का समर्थन हासिल करना होगा, जो मौजूदा परिस्थितियों में मुश्किल माना जा रहा है।
गठबंधन में बढ़ी तकरार
दूसरी ओर, जेएमएम गठबंधन में राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के चार और सीपीआई (एमएल) के दो विधायक भी शामिल हैं। आरजेडी सरकार का हिस्सा है और मंत्रिमंडल में उसका एक मंत्री भी है। इसलिए, आरजेडी द्वारा कांग्रेस के पक्ष में अलग रुख अपनाने की संभावना बेहद कम मानी जा रही है। यही कारण है कि कांग्रेस का रास्ता फिलहाल मुश्किल दिख रहा है।
इस बीच, विपक्षी गठबंधन की स्थिति भी दिलचस्प है। भाजपा के नेतृत्व वाले विपक्ष के पास कुल 24 विधायक हैं, जिनमें से 21 भाजपा के और एक-एक विधायक जेडीयू, एलजेपी और एजेएसयू के हैं। भाजपा को जीत के लिए आवश्यक संख्या तक पहुंचने के लिए केवल चार अतिरिक्त वोटों की आवश्यकता होगी। यदि सत्ताधारी गठबंधन के भीतर वोटों का विभाजन होता है, तो भाजपा की जीत की संभावना और भी मजबूत हो सकती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों में राज्यसभा चुनाव का परिणाम केवल प्रथम वरीयता वोटों पर निर्भर नहीं करेगा। यदि मुकाबला त्रिकोणीय या बहुकोणीय होता है, तो द्वितीय वरीयता वोट निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। इसलिए, सभी दल अपने राजनीतिक गठबंधनों को मजबूत करने के लिए प्रयासरत हैं।
झारखंड राज्यसभा चुनाव अब महज संसदीय मुकाबला नहीं रह गया है, बल्कि सत्ताधारी गठबंधन के भीतर शक्ति संतुलन और राजनीतिक प्रभाव की परीक्षा बन गया है। आने वाले दिनों में उम्मीदवारों की अंतिम घोषणा और समर्थन जुटाने की रणनीतियों से राज्य की राजनीति और भी तीव्र हो सकती है।
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