Sunday Lifestyle: कहते हैं कि भगवान ने छह दिन दुनिया बनाई और सातवें दिन आराम किया। उसी तर्ज पर इंसानों के लिए बना था… संडे! एक ऐसा पावन दिन, जब इंसान गधे की तरह खटने के बाद अपनी टांगें पसार सके। लेकिन आज के इस डिजिटल कलियुग में संडे की ऐसी-तैसी हो चुकी है। आजकल इंसान की सुबह आँख खुलने से नहीं, बल्कि स्मार्टफोन के ‘अलार्म’ से होती है। आँख बाद में खुलती है, हाथ में मोबाइल पहले आता है। बिस्तर पर लेटे-लेटे, बिना ब्रश किए, ‘गुड मॉर्निंग’ की ताज़ा हवा खाने के बजाय हम कंबल के अंदर ही उंगलियां घिसने लगते हैं और ‘इंस्टाग्राम रील्स’ स्क्रॉल होने लगती हैं। नतीजा? जो संडे कभी ‘लेज़ी संडे’ हुआ करता था, वो अब ‘स्क्रीन संडे’ बनकर दम तोड़ चुका है। हमारा ‘डिजिटल डिटॉक्स’ का इरादा तो बस बेड पर ही ढेर हो जाता है।
Sunday Lifestyle: क्या सोशल मीडिया ने रविवार का सुकून खत्म कर दिया?
ज़रा फ्लैशबैक की गाड़ी में बैठिए और याद कीजिए वो पुराना, संस्कारी रविवार। तब संडे का मतलब कोई ‘नोटिफिकेशन’ या ‘ईमेल’ का भयंकर टेंशन नहीं होता था। तब संडे की सुबह रेडियो पर अमीन सयानी की आवाज़ या फरमाइशी गानों के इंतज़ार से गुलज़ार होती थी। बालकनी में आराम से बैठना, बिना किसी हड़बड़ी के चाय की सुड़कती प्याली के साथ अख़बार का एक-एक पन्ना पलटना एक मुकम्मल इबादत जैसा था। और दोपहर? दोपहर का मतलब होता था… बिना किसी अलार्म के, घोड़े बेचकर ऐसी तगड़ी तानना कि सीधे शाम की चाय पर ही होश आए। न कोई ‘स्टेटस’ अपडेट करने की जल्दी थी, न ‘स्टोरी’ लगाने का कोई प्रेशर। तब फुर्सत सचमुच चाय की प्याली से झांकती थी, आज तो वो स्क्रीन की ‘लो-बैटरी’ के खौफ़ में कहीं दफ़्न हो गई है।
कैसे मोबाइल ने छीन ली हमारी फुर्सत
आजकल के संडे का हाल तो ‘धोबी का कुत्ता, न घर का न घाट का’ वाला हो गया है। हम वीकेंड का लुत्फ़ उठाने के चक्कर में इतने बिजी हो जाते हैं कि मंडे की सुबह तक थकान से बदन टूट रहा होता है। अब तो लोग रिलैक्स होने के लिए भी किसी महंगे ‘कैफ़े’ में जाते हैं। पर वहाँ भी सुकून से कॉफ़ी पीने के बजाय पहले पांच एंगल से फोटो खींचेंगे, ‘पाउट’ बनाएंगे, फिर फिल्टर लगाकर पोस्ट करेंगे, ताकि पूरी दुनिया को चिढ़ा सकें कि ‘लुक, आई एम एंजॉइंग माई संडे!’ अरे भाई, जब तक फोटो पर पचास ‘लाइक्स’ और ‘कमेंट्स’ न आएं, तब तक तो पेट का खाना ही हज़म नहीं होता। इसे फुर्सत नहीं, ‘दिखावे का दौरा’ कहते हैं। सोशल मीडिया के इस मायाजाल ने हमसे हमारी वो बेफ़िक्री छीन ली है, जो कभी संडे की असली जान हुआ करती थी। लोग पागलों की तरह स्क्रीन पर अंगूठा घिसे जा रहे हैं, जैसे स्क्रीन के अंदर से कोई अलादीन का जिन निकलने वाला हो!
तो बॉस, इस रविवार आपके इस भाई यानी आरजे राकेश की एक छोटी सी गुज़ारिश मान लीजिए। आज के दिन अपनी इन मासूम उंगलियों को थोड़ा रहम दीजिए। इस सोशल मीडिया रूपी दलदल से खुद को ‘लॉग-आउट’ करिए और अपनी असली ज़िंदगी में ‘लॉग-इन’ कीजिए। कम से कम एक घंटे के लिए अपने इस चौबीस घंटे के वफ़ादार चमचे यानी स्मार्टफोन को साइलेंट करिए और किसी अलमारी के सबसे अंधेरे कोने में छुपा दीजिए।
Sunday Lifestyle: फुर्सत की तलाश में भटकता आधुनिक इंसान
घर के लोगों के साथ बैठिए, मम्मी-पापा या बीवी-बच्चों के आमने-सामने बैठकर सुख-दुख की दो बातें कीजिए। पुरानी सड़ी-गली यादों को ताज़ा करके ज़रा ठहाके लगाइए, या फिर कुछ नहीं तो बिना किसी वज़ह के बस छत के पंखे को ही गोल-गोल घूमते निहारते रहिए। यकीन मानिए, दुनिया का कोई भी ‘वायरल वीडियो’ उस सुकून की बराबरी नहीं कर सकता जो अपनों के बीच बैठकर खिलखिलाने से मिलता है। तो फिर देर किस बात की? तुरंत फोन रखिए, चाय का दूसरा कप मंगवाइए और इस संडे को सचमुच का ‘फ्री-डे’ बना डालिए!
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