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Guru Purnima: गुरु-परंपरा की ऐतिहासिक यात्रा और गुरु पूर्णिमा का सांस्कृतिक और तांत्रिक महत्व: डॉ. धरवेश कठेरिया

Guru Purnima: The Historical Journey of the Guru Tradition and the Cultural and Tantric Significance of Guru Purnima – Dr. Dharvesh Katheria
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Guru Purnima: “गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥” अर्थ: गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश के समान माना गया है। वे ही परब्रह्म का साक्षात् स्वरूप हैं। ऐसे श्रीगुरु को नमस्कार है।

Guru Purnima: गुरु पूर्णिमा कब मनाया जाता हैं ?

गुरु पूर्णिमा 2026 इस वर्ष 28–29 जुलाई (मंगल–बुध) को मनाई जाएगी। हिन्दू पंचांग के अनुसार यह आषाढ़ मास की पूर्णिमा है। पूर्णिमा तिथि 28 जुलाई को सायं 6:18 बजे प्रारंभ होगी और 29 जुलाई को सायं 8:05 बजे समाप्त होगी। गुरु पूर्णिमा हिन्दू, जैन और बौद्ध परंपराओं का एक पवित्र पर्व है, जो आध्यात्मिक, शैक्षिक तथा जीवन-पथ का मार्गदर्शन करने वाले गुरुओं के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और सम्मान व्यक्त करने के लिए समर्पित है।

भारत की सांस्कृतिक पहचान यदि किसी एक सूत्र में समाहित होती है, तो वह है गुरु-शिष्य परंपरा। यही वह परंपरा है जिसने हजारों वर्षों तक केवल धार्मिक ज्ञान ही नहीं, बल्कि दर्शन, विज्ञान, गणित, आयुर्वेद, संगीत, नाट्य, योग, वास्तु, खगोल, राजनीति और आध्यात्मिक चिंतन को भी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक सुरक्षित पहुँचाया। भारतीय सभ्यता में गुरु केवल शिक्षक नहीं, बल्कि ज्ञान, विवेक, संस्कार और आत्मबोध के मार्गदर्शक माने गए हैं। इसी अमूल्य परंपरा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का पर्व है गुरु पूर्णिमा।

आषाढ़ मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह पर्व भारतीय संस्कृति का एक ऐसा उत्सव है, जो केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। यह ज्ञान, विनम्रता, परंपरा और आत्मविकास का उत्सव है। इस दिन शिष्य अपने गुरु के प्रति श्रद्धा प्रकट करते हैं, जबकि समाज उन सभी व्यक्तियों को सम्मान देता है जिन्होंने ज्ञान और नैतिक मूल्यों के प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

गुरु पूर्णिमा का संबंध महर्षि वेदव्यास से भी जोड़ा जाता है, इसीलिए इसे व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। महर्षि वेदव्यास भारतीय ज्ञान-परंपरा के उन महान ऋषियों में गिने जाते हैं जिन्होंने वेदों का संकलन एवं वर्गीकरण किया, महाभारत जैसे विश्व के विशालतम महाकाव्य की रचना की तथा अठारह महापुराणों की परंपरा को व्यवस्थित रूप प्रदान किया। उनके कार्यों ने भारतीय सभ्यता की बौद्धिक और आध्यात्मिक नींव को सुदृढ़ बनाया।

इतिहासकारों और भारतीय परंपराओं में यह विश्वास प्रचलित है कि महर्षि वेदव्यास ने विशाल वैदिक साहित्य को चार भागों, अर्थात् ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद, में व्यवस्थित किया, जिससे अध्ययन और संरक्षण का कार्य अधिक सुगम हुआ। परंपरा के अनुसार इसी पूर्णिमा के दिन महर्षि व्यास ने वेद को चार भागों में विभाजित किया था और अपने शिष्यों को ब्रह्मसूत्रों का उपदेश देना भी प्रारम्भ किया था। इसलिए उन्हें केवल एक ऋषि नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान-संस्कृति के महान संपादक और संरक्षक के रूप में भी स्मरण किया जाता है।

उपनिषदों और गीता में गुरु का महत्व
भारतीय दर्शन में गुरु का महत्व केवल शास्त्रों के अध्ययन तक सीमित नहीं है। उपनिषदों में स्पष्ट कहा गया है:
आचार्यवान् पुरुषो वेद।
(छान्दोग्य उपनिषद्)

अर्थ: जिसके पास योग्य आचार्य या गुरु है, वही वास्तविक ज्ञान प्राप्त कर सकता है। यह वाक्य भारतीय शिक्षा-दर्शन का मूल सिद्धांत माना जाता है।

इसी प्रकार श्वेताश्वतर उपनिषद् में कहा गया है:
यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ।
तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः॥

अर्थ: जिस साधक की भगवान के प्रति जैसी श्रद्धा हो, वैसी ही श्रद्धा यदि गुरु के प्रति भी हो, तभी शास्त्रों का वास्तविक अर्थ उसके समक्ष प्रकाशित होता है।

बृहदारण्यक उपनिषद् में साधकों द्वारा सहस्राब्दियों से उच्चरित एक प्रार्थना इस भावना को और स्पष्ट करती है:
असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मा अमृतं गमय॥

अर्थ: मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलें, अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलें, मृत्यु से अमृतत्व की ओर ले चलें। गुरु पूर्णिमा वह दिन है जब यह प्रार्थना कृतज्ञतापूर्वक उस गुरु को समर्पित की जाती है, जिन्होंने पहले ही इसका उत्तर देना आरम्भ कर दिया है।

भगवद्गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को ज्ञान प्राप्त करने की विधि बताते हुए कहते हैं:
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥ (भगवद्गीता 4.34)

अर्थ: विनम्रता, जिज्ञासा और सेवा-भाव से गुरु के पास जाओ। तत्त्वदर्शी ज्ञानी तुम्हें सत्य का ज्ञान प्रदान करेंगे।
इन शास्त्रीय प्रमाणों से स्पष्ट होता है कि भारतीय ज्ञान-परंपरा में गुरु का स्थान केवल सामाजिक सम्मान का विषय नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और बौद्धिक विकास की आधारशिला है।

“गुरु” शब्द की व्युत्पत्ति और गुरुकुल परंपरा
गुरु शब्द की व्युत्पत्ति भी अत्यंत अर्थपूर्ण मानी गई है। परंपरागत व्याख्या के अनुसार “गु” का अर्थ है अंधकार और “रु” का अर्थ है उसका नाश करने वाला। अर्थात गुरु वह है जो अज्ञान रूपी अंधकार को ज्ञान के प्रकाश से दूर करता है। यह व्याख्या केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि भारतीय शिक्षा-दर्शन के गहन अर्थ को भी व्यक्त करती है।

गुरु-शिष्य संबंध का इतिहास

भारत में गुरु-शिष्य संबंध का इतिहास वैदिक युग से प्रारंभ होता है। उस समय शिक्षा का प्रमुख केंद्र गुरुकुल हुआ करते थे, जहाँ विद्यार्थी केवल ग्रंथों का अध्ययन ही नहीं करते थे, बल्कि अनुशासन, आत्मसंयम, सेवा, श्रम, प्रकृति के साथ सामंजस्य और सामाजिक उत्तरदायित्व जैसे जीवन-मूल्यों का भी अभ्यास करते थे। शिक्षा का उद्देश्य केवल जीविका नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण और व्यक्तित्व का समग्र विकास माना जाता था।

इसी परंपरा ने आगे चलकर तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला, वल्लभी और कांची जैसे महान शिक्षा-केंद्रों को जन्म दिया, जहाँ भारत ही नहीं बल्कि एशिया के अनेक देशों से विद्यार्थी अध्ययन करने आते थे। समय के साथ गुरु का स्वरूप भी विस्तृत होता गया। वैदिक ऋषियों से लेकर आदि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, गोरखनाथ, ज्ञानेश्वर, रामानंद, कबीर, गुरु नानक, चैतन्य महाप्रभु, स्वामी विवेकानंद और अनेक संतों ने गुरु-परंपरा को नए आयाम दिए।

गुरु के तीन प्रकार
सनातन धर्म में गुरु तीन प्रकार के माने गए हैं:
● शिक्षा गुरु: जो कौशल तथा औपचारिक ज्ञान प्रदान करते हैं।
● दीक्षा गुरु: जो शिष्य को आध्यात्मिक साधनाओं अथवा मंत्रों की दीक्षा देते हैं।
● सद्गुरु: ऐसे गुरु जिन्होंने परम सत्य का साक्षात्कार किया है और साधक का मार्गदर्शन मुक्ति तक करते हैं।
पृथ्वी पर दिव्य अवतारों ने भी गुरु स्वीकार किए। भगवान श्रीराम ने महर्षि वसिष्ठ का अनुसरण किया, भगवान श्रीकृष्ण ने महर्षि सान्दीपनि से शिक्षा प्राप्त की, और अर्जुन ने द्रोणाचार्य से शिक्षा ग्रहण की। यह दर्शाता है कि गुरु के प्रति समर्पण किसी सामान्य साधक तक सीमित नहीं, अपितु स्वयं महापुरुषों के जीवन का भी अभिन्न अंग रहा है।

गुरु (बृहस्पति) ग्रह से ज्योतिषीय संबंध
वैदिक ज्योतिष में बृहस्पति ग्रह को गुरु कहा जाता है, और यह नामकरण किसी भी प्रकार से आकस्मिक नहीं है। बृहस्पति को समस्त नवग्रहों में सर्वाधिक शुभ तथा कल्याणकारी ग्रह माना जाता है। उनका संबंध ज्ञान, उच्च शिक्षा, धर्म, समृद्धि तथा आध्यात्मिक उन्नति से है। अतः यह अत्यंत उपयुक्त है कि गुरु पूर्णिमा ऐसे काल में आती है जो ज्योतिषीय दृष्टि से इस ग्रह की ऊर्जाओं के अनुरूप माना जाता है।

पूर्णिमा के दिन आने वाली गुरु पूर्णिमा का विशेष सांकेतिक महत्व भी है, क्योंकि चंद्रमा मन का प्रतीक है, जबकि गुरु ज्ञान के प्रतीक हैं। जब मन पूर्ण तथा ग्रहणशील होता है, तब ज्ञान का पूर्ण प्रतिबिम्ब उसमें प्रकट हो सकता है। आध्यात्मिक दृष्टि से यह हमें सिखाता है कि शुद्ध हुआ मन ही गुरु की कृपा को ग्रहण करने में समर्थ हो पाता है।

गुरु पूर्णिमा के अनुष्ठान और परंपराएँ
गुरु पूर्णिमा के अनुष्ठान क्षेत्र, परंपरा तथा संप्रदाय के अनुसार भिन्न-भिन्न होते हैं, तथापि उन सभी का एक समान सूत्र है, कर्म के माध्यम से व्यक्त की गई कृतज्ञता।

गुरु पूजा अथवा गुरु पादुका पूजा: इस दिवस के पालन का प्रमुख अनुष्ठान गुरु के पवित्र चरणों अथवा उनकी पादुकाओं की विधिपूर्वक पूजा है। शिष्य गुरु के चरणों का प्रक्षालन करते हैं, पुष्पमाला अर्पित करते हैं तथा चंदन-कुमकुम अर्पित करते हैं।

मंत्र जप तथा स्तोत्र पाठ: अनेक परिवारों तथा आश्रमों में गुरु गीता तथा गुरु स्तोत्र के श्लोकों का पाठ किया जाता है।
सत्संग: अनेक आध्यात्मिक तथा मठीय परंपराओं में इस दिन सत्संगों में शास्त्र, दर्शन तथा शिष्यत्व जैसे विषयों पर प्रवचन आयोजित किए जाते हैं।

व्रत, दान तथा सेवा: इस दिन प्रायः फलाहार व्रत रखा जाता है और निर्धनों, विद्यार्थियों अथवा धार्मिक संस्थाओं को अन्न, वस्त्र, धन तथा शैक्षिक सामग्री का दान दिया जाता है।

औपचारिक दीक्षा: जो साधक किसी विशिष्ट परंपरा का अनुसरण करते हैं, उनके लिए यह दिन शिष्यत्व के व्रतों का नवीकरण करने अथवा नई दीक्षा प्राप्त करने का अवसर भी होता है।

गुरु-तत्त्व और तंत्र साधना
भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान केवल ज्ञान देने वाले व्यक्ति का नहीं है। गुरु वह सेतु है जो मनुष्य को अज्ञान से ज्ञान, भ्रम से सत्य और सीमित दृष्टि से व्यापक चेतना की ओर ले जाता है। भारतीय परंपरा में गुरु की महिमा का वर्णन अनेक ग्रंथों में मिलता है। एक प्रसिद्ध श्लोक है:
अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्।
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
इसी प्रकार गुरुगीता में कहा गया है:
ध्यानमूलं गुरोर्मूर्तिः पूजामूलं गुरोः पदम्।
मन्त्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरोः कृपा॥
अर्थ: गुरु का स्वरूप ध्यान का आधार है, गुरु के चरण श्रद्धा का आधार हैं, गुरु का वचन साधना का आधार है और गुरु की कृपा आत्मबोध का मार्ग प्रशस्त करती है।

भारतीय दर्शन में गुरु का महत्व केवल वेदांत या भक्ति परंपरा तक सीमित नहीं है। योग, सांख्य, तंत्र, नाथ परंपरा, शैव दर्शन, शाक्त साधना, बौद्ध वज्रयान तथा जैन परंपरा सहित अनेक आध्यात्मिक धाराओं में गुरु का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है।

आधुनिक समाज में “तंत्र” शब्द को लेकर अनेक प्रकार की भ्रांतियाँ प्रचलित हैं। फिल्मों, लोककथाओं और अंधविश्वासों के कारण अनेक लोग तंत्र को केवल चमत्कार, जादू-टोना या भय से जोड़कर देखते हैं, जबकि भारतीय दार्शनिक परंपरा में तंत्र का स्वरूप इससे कहीं अधिक व्यापक और गंभीर है। तंत्र किसी एक ग्रंथ या संप्रदाय का नाम नहीं, बल्कि अनेक शैव, शाक्त और वैष्णव परंपराओं का व्यापक साहित्य और दार्शनिक आधार है। इसका मूल उद्देश्य बाहरी चमत्कार उत्पन्न करना नहीं, बल्कि मनुष्य की चेतना को परिष्कृत करना माना गया है।

तंत्र-साधना में गुरु की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी गई है, क्योंकि तंत्र केवल सैद्धांतिक अध्ययन का विषय नहीं, बल्कि अनुशासन, आचरण और दार्शनिक समझ की परंपरा भी है। कुलार्णव तंत्र में कहा गया है कि गुरु के बिना साधना का वास्तविक उद्देश्य समझना अत्यंत कठिन है। शैव परंपरा में भगवान शिव को आदियोगी और आदि गुरु कहा जाता है, तथा शाक्त परंपरा में देवी को परम चेतना का प्रतीक माना गया है।

सच्चे गुरु के लक्षण
शास्त्र यह भी स्पष्ट करते हैं कि गुरु होने का दावा करने वाला प्रत्येक व्यक्ति इस पद का अधिकारी नहीं होता। परंपरा के अनुसार गुरु को वास्तविक तभी माना जाता है यदि:
● उन्होंने काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद तथा मत्सर, इन षड्रिपुओं पर विजय प्राप्त कर ली हो।
● वे समस्त जीवों के प्रति गहन करुणा रखते हों।
● उनके सान्निध्य से मन की चंचलता शांत होती हो।
● उनकी शिक्षाएँ धर्म के अनुरूप हों।
● वे साधक को स्वावलम्बी बनाएँ, परावलम्बी नहीं।

कुलार्णव तंत्र स्पष्ट रूप से कहता है कि सच्चा गुरु अत्यधिक व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से रहित होता है, धन से विचलित नहीं होता, तथा मंत्र, यंत्र अथवा आध्यात्मिक उपदेश का धन के लिए विनिमय नहीं करता। तांत्रिक दीक्षा-विधान के ग्रंथों के अनुसार, शिष्य को दीक्षा देने की वास्तविक पात्रता के लिए गुरु को सूक्ष्म शरीर के केन्द्रों पर प्रभुत्व तथा जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय जैसी चेतना की विभिन्न अवस्थाओं में पारंगतता भी आवश्यक बताई गई है।

इतिहासकारों के अनुसार तांत्रिक साहित्य का विकास प्रारंभिक मध्यकाल में विशेष रूप से दिखाई देता है, यद्यपि इसके अनेक बीज वैदिक और उत्तरवैदिक परंपराओं में भी मिलते हैं। कश्मीर शैव दर्शन, श्रीविद्या परंपरा, कौल परंपरा तथा अनेक शाक्त परंपराओं ने भारतीय दर्शन, मंदिर स्थापत्य, मूर्तिकला, नृत्य, संगीत और चित्रकला को भी समृद्ध किया।

भारतीय ग्रंथों में गुरु को तंत्र का द्वार कहा गया है, क्योंकि गुरु केवल शास्त्र नहीं पढ़ाता, बल्कि शास्त्र को समझने की दृष्टि भी देता है। संत कबीर का प्रसिद्ध दोहा आज भी उतना ही प्रासंगिक है:
गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥

कबीर का आशय यह नहीं कि गुरु ईश्वर से बड़ा है, अपितु यह कि गुरु ही वह माध्यम है जो मनुष्य को सत्य और ईश्वर की ओर ले जाता है। इसलिए गुरु का सम्मान ज्ञान के सम्मान के समान है।

आधुनिक युग में गुरु पूर्णिमा की प्रासंगिकता
भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसने समय के साथ स्वयं को परिवर्तित किया, किन्तु अपने मूल सिद्धांतों को कभी नहीं छोड़ा। गुरु पूर्णिमा इसका श्रेष्ठ उदाहरण है। हजारों वर्षों पूर्व गुरुकुलों में मनाया जाने वाला यह पर्व आज विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, आश्रमों, मठों तथा सामाजिक संगठनों तक अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है।

आज का युग सूचना और प्रौद्योगिकी का युग है। इंटरनेट और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के माध्यम से कुछ ही क्षणों में विश्वभर का ज्ञान उपलब्ध हो जाता है, फिर भी एक प्रश्न आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उपनिषदों के समय था। क्या केवल जानकारी ही ज्ञान है? भारतीय दर्शन का उत्तर स्पष्ट है: जानकारी बुद्धि को समृद्ध कर सकती है, किन्तु ज्ञान विवेक, अनुभव और चरित्र के निर्माण से प्राप्त होता है। यही कार्य गुरु करता है।

यद्यपि खोज-यंत्र तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता असंख्य तथ्य उपलब्ध कराते हैं, तथापि वे किसी जीवित मार्गदर्शक से प्राप्त होने वाली आन्तरिक स्पष्टता, नैतिक मार्गदर्शन तथा व्यक्तिगत रूपान्तरण का स्थान नहीं ले सकते। आज लाइव-स्ट्रीम प्रवचनों के माध्यम से विभिन्न महाद्वीपों में स्थित शिष्य भी अपने गुरु के उपदेशों को उसी समय सुन सकते हैं, और ऑनलाइन समुदाय एकत्र होकर सामूहिक रूप से गुरु गीता का जप भी करते हैं। तकनीक ने इस पर्व के पालन के स्वरूप को अवश्य बदला है, किन्तु उसकी मूल भावना को अक्षुण्ण रखा है। सच्चे ज्ञान की ज्योति केवल डाउनलोड नहीं की जा सकती, उसे एक जीवित हृदय से दूसरे जीवित हृदय तक पहुँचाया जाना आवश्यक है।

स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि शिक्षा का उद्देश्य केवल तथ्यों का संग्रह नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर निहित पूर्णता का विकास है। यही विचार भारतीय गुरु-परंपरा की आत्मा है। गुरु केवल उत्तर नहीं देता, वह प्रश्न पूछने की क्षमता भी विकसित करता है।

महर्षि वेदव्यास का स्मरण भी इसी कारण महत्वपूर्ण है। उन्होंने केवल ग्रंथों की रचना नहीं की, बल्कि ज्ञान को व्यवस्थित और सुरक्षित रखने का महान कार्य किया। यदि ज्ञान को संरक्षित न किया जाए, तो सभ्यता की स्मृति धीरे-धीरे समाप्त हो जाती है। वेदव्यास का जीवन हमें यह सिखाता है कि ज्ञान का संरक्षण भी उतना ही आवश्यक है जितना उसका सृजन।
आज आवश्यकता इस बात की है कि तंत्र को अंधविश्वास और सनसनी से अलग करके उसके ऐतिहासिक, दार्शनिक और सांस्कृतिक स्वरूप में समझा जाए। इसी प्रकार गुरु पूर्णिमा को केवल धार्मिक अनुष्ठान न मानकर ज्ञान, अनुशासन, संस्कृति और मानवीय मूल्यों के उत्सव के रूप में देखा जाए।

गुरु पूर्णिमा का संदेश केवल अतीत का गौरवगान नहीं है। यह वर्तमान को दिशा और भविष्य को आधार प्रदान करने वाला पर्व है। यह हमें विनम्रता, जिज्ञासा, अनुशासन, अध्ययन और सतत सीखने की प्रेरणा देता है। गुरु केवल आश्रमों में नहीं मिलते। माता-पिता, शिक्षक, वैज्ञानिक, साहित्यकार, कलाकार, दार्शनिक और वे सभी व्यक्ति जो समाज को सही दिशा देते हैं, व्यापक अर्थ में गुरु हैं।

अंततः गुरु पूर्णिमा हमें यह सिखाती है कि ज्ञान का प्रकाश तभी सार्थक है जब वह मानवता, करुणा, सत्य और आत्मविकास की दिशा में प्रयुक्त हो। भारतीय संस्कृति का यही शाश्वत संदेश है कि गुरु के प्रति श्रद्धा, ज्ञान के प्रति समर्पण और सत्य की खोज ही जीवन की वास्तविक साधना है। यही गुरु पूर्णिमा का सार है और यही भारत की सनातन ज्ञान-परंपरा की सबसे अमूल्य धरोहर भी।

“तमसो मा ज्योतिर्गमय।”
अर्थात्, हमें अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर ले चलो। यही गुरु का संदेश है, यही गुरु पूर्णिमा का संदेश है और यही भारतीय संस्कृति का सनातन आदर्श है।

लेखक : डॉ. धरवेश कठेरिया
एसोसिएट प्रोफेसर, जनसंचार विभाग
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा।

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Shalini Sinha

Shalini Sinha is a Bihar & Jharkhand-based journalist from Dhanbad, specializing in politics, entertainment, education, society, and current affairs. Known for her clear, accurate, and accessible writing style, she effectively bridges complex issues for the public. She also serves as a key content writer for the digital platform,Voice over artist And Digital Anchoring Mithila Top.

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