RIMS 2 Andolan: झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा नेता चंपाई सोरेन ने नगड़ी में प्रस्तावित रिम्स-2 अस्पताल के निर्माण के खिलाफ एक बड़े आंदोलन की घोषणा की है। उन्होंने कहा कि अगले दस दिनों के भीतर लाखों आदिवासी और स्वदेशी लोग नगड़ी के किसानों के समर्थन में एकजुट होंगे और सरकार की भूमि अधिग्रहण नीति के खिलाफ आवाज उठाएंगे।
मीडिया से बात करते हुए चंपाई सोरेन ने राज्य सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि रांची और आसपास के इलाकों में सैकड़ों एकड़ सरकारी जमीन उपलब्ध होने के बावजूद सरकार उपजाऊ कृषि भूमि पर अस्पताल बनाने पर अड़ी है। इससे सरकार की मंशा पर सवाल उठते हैं।
HEC की जमीन छोड़ किसानों की जमीन क्यों?
पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार ने HEC से पहले ही सैकड़ों एकड़ जमीन अधिग्रहित कर ली है और भविष्य में 500 एकड़ से अधिक जमीन अधिग्रहित करने की तैयारी कर रही है। तो, अगर उद्देश्य अस्पताल बनाना है, तो HEC की उपलब्ध जमीन पर रिम्स-2 का निर्माण क्यों नहीं किया जा सकता? उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार किसानों को उनकी पुश्तैनी और उपजाऊ भूमि से बेदखल करने की कोशिश कर रही है। यह केवल विकास का मामला नहीं था, बल्कि आदिवासी-स्वदेशी समुदाय के अधिकारों और अस्तित्व से जुड़ा मुद्दा था।
RIMS 2 Andolan: हर गांव में डुगडुगी बजाया जाएगा
चंपाई सोरेन ने घोषणा की कि इस आंदोलन में व्यापक जनभागीदारी होगी। उन्होंने कहा कि प्रत्येक गाँव में डुगडुगी बजाकर लोगों को जागरूक किया जाएगा। प्रत्येक समर्थक से आंदोलन के लिए मुट्ठी भर चावल और 10 रुपये का योगदान देने का अनुरोध किया जाएगा।
उनका कहना है कि यह सिर्फ जमीन बचाने का आंदोलन नहीं है, बल्कि पानी, जंगल, जमीन और स्थानीय अधिकारों की रक्षा की लड़ाई है। यह अभियान ग्रामीणों को संगठित करेगा और बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों को जन्म देगा।
अधिग्रहण और पुनर्वास पर सवाल उठाए
पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि रांची शहर आदिवासियों और स्वदेशी लोगों की भूमि पर बसा है। उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि HEC के लिए लगभग 7,200 एकड़ भूमि अधिग्रहित की गई, जबकि संयंत्र केवल लगभग 500 एकड़ पर स्थापित किया गया। इसी प्रकार, विधि विश्वविद्यालय और अन्य परियोजनाओं के लिए भी बड़े भूभाग अधिग्रहित किए गए, लेकिन प्रभावित परिवारों को आज तक उचित पुनर्वास नहीं मिला है।
उन्होंने आरोप लगाया कि जब HEC ने अतिरिक्त भूमि सरकार को वापस की, तो उसे मूल किरायेदारों को लौटाने के बजाय अन्य उपयोगों के लिए आवंटित कर दिया गया। इससे यह सवाल उठता है कि जिन किसानों की भूमि विकास परियोजनाओं के लिए उपयोग की गई, उन्हें अंततः क्या मिला?
1957-58 में हुए अधिग्रहण पर भी सवाल उठाए गए
चंपाई सोरेन ने सरकार के इस दावे पर भी सवाल उठाया कि भूमि अधिग्रहण 1957-58 से चल रहा है। उन्होंने कहा कि उस समय हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. श्रीकृष्णा सिंह ने अधिग्रहण प्रक्रिया रोक दी थी। उनके अनुसार, स्थानीय किसान 2012 तक भू-राजस्व का भुगतान करते रहे और भूमि पर खेती करते रहे। यदि किसी को मुआवजा नहीं मिला और भूमि पर खेती जारी रही, तो अधिग्रहण प्रक्रिया को पूर्ण कैसे माना जा सकता है?
नगड़ी जमीन विवाद फिर गरमा
नगड़ी भूमि विवाद अतीत में झारखंड की राजनीति का एक प्रमुख मुद्दा रहा है। पिछले साल चंपाई सोरेन ने इस मुद्दे पर आंदोलन की घोषणा की थी। उस समय प्रशासन ने कड़ी सुरक्षा व्यवस्था लागू की और उन्हें नजरबंद भी कर दिया था। हालांकि, जनता के व्यापक समर्थन के बाद सरकार को पीछे हटना पड़ा। अब, चंपाई सोरेन की अपील ने नगड़ी भूमि विवाद को एक बार फिर राजनीतिक और सामाजिक बहस के केंद्र में ला दिया है। यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इस आंदोलन पर क्या रुख अपनाती है और आने वाले दिनों में रिम्स-2 परियोजना के संबंध में क्या निर्णय लिया जाता है।
यह भी पढ़ें:















