Home बिहार झारखंड देश-विदेश मनोरंजन खेल क्राइम शिक्षा राजनीति हेल्थ राशिफल
---Advertisement---
Advertisement
Ad
---Advertisement---
Advertisement
Ad

उर्दू दिवस केवल औपचारिकता नहीं, आत्ममंथन का अवसर बने : नजरे आलम

उर्दू दिवस केवल औपचारिकता नहीं, आत्ममंथन का अवसर बने : नजरे आलम
---Advertisement---

Darbhanga News: ऑल इंडिया मुस्लिम बेदारी कारवां के नेशनल प्रेसिडेंट नजरे आलम ने कहा कि आज उर्दू दिवस मनाया जा रहा है, लेकिन यह दिन सिर्फ़ औपचारिक कार्यक्रमों और बयानों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि यह आत्म-मंथन का मौका होना चाहिए। बिहार वह राज्य है जिसने उर्दू भाषा, संस्कृति और साहित्यिक विरासत को समृद्ध किया है, लेकिन बिहार में उर्दू की मौजूदा हालत हम सभी के लिए चिंता का विषय है।

यह मानना ​​होगा कि राज्य स्तर पर उर्दू को लेकर गंभीरता रही है, और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने समय-समय पर भाषा और संस्कृति के संरक्षण की बात कही है। इसके बावजूद, ज़मीनी स्तर पर उर्दू को वह गति नहीं मिल पा रही है जिसकी वह हकदार है। इसका एक बड़ा कारण संस्थागत जड़ता और खुद उर्दू बोलने वाले समुदाय की सामूहिक चुप्पी है।

बिहार में उर्दू की स्थिति चिंता का विषय: नजरे आलम

कड़वी सच्चाई यह है कि बड़ी संख्या में लोग उर्दू के नाम पर अपनी रोज़ी-रोटी कमा रहे हैं। उर्दू के प्रोफेसर, शिक्षक, अनुवादक और विभिन्न संस्थानों से जुड़े लोग उर्दू के ज़रिए अपना गुज़ारा कर रहे हैं, लेकिन जब उर्दू को बढ़ावा देने, नई पीढ़ी से जुड़ने, या उर्दू से जुड़े शैक्षिक और प्रशासनिक मुद्दों को उठाने की बात आती है, तो एक प्रभावी और संगठित आवाज़ साफ़ तौर पर गायब है।

यह भी पढ़ें: मकर संक्रांति पर सुधा डेयरी पूरी तरह तैयार, दूध-दही-घी की होगी भरपूर सप्लाई

न तो उर्दू शिक्षकों के खाली पदों को लेकर कोई ठोस आंदोलन है, और न ही उर्दू माध्यम की शिक्षा और एक विषय के रूप में उर्दू की गुणवत्ता पर कोई गंभीर बहस हो रही है। सरकारी और सामाजिक स्तर पर उर्दू के व्यावहारिक उपयोग को बढ़ाने के लिए अपेक्षित प्रयास भी नहीं किए जा रहे हैं। इसका दोष किसी एक सरकार या व्यक्ति पर डालना सही नहीं होगा; बल्कि, हमें ईमानदारी से अपनी भूमिका और ज़िम्मेदारी पर विचार करना चाहिए।

उर्दू दिवस हमें याद दिलाता है कि भाषाएँ सिर्फ़ उत्सव मनाने से नहीं, बल्कि लगातार प्रयास और सतर्क संघर्ष से जीवित रहती हैं। अगर उर्दू से जुड़े लोग अपनी ज़िम्मेदारियाँ पूरी नहीं करते हैं, तो अकेले सरकार से सब कुछ उम्मीद करना सही नहीं है।

यह भी पढ़ें: पुटकी के गोपालचक हनुमान मंदिर मैदान में भव्य शिव कथा का आयोजन

आज ज़रूरत है कि सरकार, शिक्षण संस्थान और उर्दू से जुड़े लोग मिलकर एक ठोस और व्यावहारिक रणनीति बनाएँ। उर्दू की सुरक्षा संघर्ष से नहीं, बल्कि सहयोग, जागरूकता और सामूहिक प्रयास से होगी। अगर हम आज भी अपनी चुप्पी नहीं तोड़ते हैं, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमसे सवाल करेंगी।

Join WhatsApp

Join Now

Join Telegram

Join Now

Leave a Comment