Digital Politics India: आज के छलावे से भरे दौर में जब छह इंच की मोबाइल स्क्रीन पर सरकारें बनती और बिगड़ती दिखाई देती हैं, तब बिहार और झारखंड की गद्दी का असली रास्ता आज भी धूल उड़ती पगडंडियों, खेत की मेड़ों और चाय की अड़ियों से होकर ही गुज़रता है। सोशल मीडिया के कृत्रिम ‘ट्रेंड्स’ और ज़मीन के वास्तविक ‘सेंटिमेंट्स’ के दर्मियान जो भारी खाई पैदा हो चुकी है, वही आज की सियासत का सबसे बड़ा और कड़वा सच है। इस डिजिटल मायाजाल के बीच एक ख़ामोश इंक़लाब पक रहा है, जिसकी आहट को भांपने में बड़े-बड़े धुरंधर नाकाम साबित हो रहे हैं।
Digital Politics India: बदल रही है राजनीति
स्मार्टफोन क्रांति ने हर हाथ में सस्ता डेटा तो दे दिया, लेकिन इसके साथ आया है ‘प्रोपेगैंडा’। फेसबुक रील्स, यूट्यूब शॉट्स और वॉट्सऐप यूनिवर्सिटी के कारख़ानों में चौबीसों घंटे एक ऐसा ‘नैरेटिव’ बनाया जाता है जिसका हक़ीक़त से कोई वास्ता नहीं होता। डिजिटल स्क्रीन पर जब विकास के चमचमाते आंकड़े परोसे जा रहे होते हैं, ठीक उसी वक़्त ग्राउंड ज़ीरो का नौजवान रोज़गार की तलाश में पलायन करने के लिए मजबूर होता है। वह हुक्मरानों से यह कड़ा सवाल पूछ रहा है कि आख़िर बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियां और नौकरियां विज्ञापनों से निकलकर ज़मीन पर कब उतरेंगी?
यही सूरत-ए-हाल झारखंड की भी है। सोशल मीडिया पर जल-जंगल-ज़मीन के संरक्षण के बड़े-बड़े दिलकश नारे गूंजते हैं, मगर धरातल पर रहने वाला युवा आज भी अपनी डोमिसाइल पॉलिसी और सबसे दर्दनाक… बार-बार होने वाले ‘पेपर लीक’ जैसे समस्याओं पर व्यवस्था से सीधे दो-दो हाथ कर रहा है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में अपनी जवानी की सबसे कीमती रातें काली करने वाले स्टूडेंट्स जब सड़कों पर उतरकर लाठियां खाते हैं, तब मोबाइल स्क्रीन का वह चमकीला प्रोपेगैंडा एक पल में धुंआ हो जाता है।
अब काम पर होगा वोट
क्षेत्रीय गतिकी (रीजनल डायनेमिक्स) का यह नया मोड़ बेहद दिलचस्प है। अब छात्र बिरादरी उन चेहरों को सिरे से ख़ारिज कर रही है जो एसी कमरों में बैठकर सिर्फ़ ट्वीट और पोस्ट करते हैं। युवा अब ‘लाइक’, ‘शेयर’ और ‘कमेंट’ देखकर अपना कीमती वोट बर्बाद नहीं कर रहे, बल्कि संकट के वक़्त उनके हक़ के लिए सड़क पर लाठी खाने वाले ‘नवेले’ नेताओं के जज़्बे को तौल रहे हैं।
एक दौर था जब जाति विशेष के जज़्बाती नारों पर पूरा का पूरा चुनाव पलट जाता था। लेकिन आज के ‘एस्पिरेशनल’ महत्वाकांक्षी युवाओं का मिज़ाज बदल चुका है। वोटर अब बेहद ‘साइलेंट’ और ‘स्मार्ट’ हो गया है। वह रील्स देखकर मुस्कुरा ज़रूर देता है, लेकिन पोलिंग बूथ के भीतर जाकर ईवीएम का बटन दबाते समय वह अपने बुझते हुए भविष्य, बदहाल लाइब्रेरी और पेपर लीक का दंश याद रखता है।
सोशल मीडिया का यह प्रोपेगैंडा सिर्फ़ ‘ओपिनियन’ का एक फ़र्ज़ी भ्रम पैदा कर सकता है, पेट नहीं भर सकता। साफ़ है कि चुनाव अब सिर्फ़ मोबाइल स्क्रीन पर नहीं जीते जा सकते। डिजिटल मीडिया सूचना पहुंचाने का एक उपयोगी ज़रिया ज़रूर है, लेकिन वह ज़मीनी जन-संपर्क का विकल्प कभी नहीं हो सकता। खोखले नारों का दौर अब रुख़सत हो चुका है, अब बारी सिर्फ़ और सिर्फ़ ठोस काम, इंसाफ़ और जवाबदेही की है।
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